क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

87. स्वस्थ कौन?


स्वस्थ कौन?

                स्वस्थ का मतलब है- स्व में स्थित हो जाना अर्थात अपने निज स्वरूप में आ जाना या विभाव अवस्था से स्वभाव में आ जाना। जैसे अग्नि के सम्पर्क से पानी गरम हो जाता है, उबलने लगता है। परन्तु जैसे ही अग्नि से उसको अलग करते हैं, धीरे-धीरे वह ठण्डा हो जाता है। शीतलता पानी का स्वभाव है, उष्णता नहीं। उसको वातावरण के अनुरूप रखने के लिये किसी बाह्य आलम्बन की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार शरीर में जैसे हड्डियों का स्वभाव कठोरता है, परन्तु किसी कारणवश कोई हड्डी नरम हो जाए तो रोग का कारण बन जाती है। मांसपेशियों का स्वभाव लचीलापन है, परन्तु उसमें कहीं कठोरता आ जाती है तो गाँठ बन जाती है, तो शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। हृदय एवं रक्त को शरीर में अपेक्षाकृत गरम रहना चाहिये, परन्तु यदि वे ठण्डे हो जाए। मस्तिष्क तनावमुक्त शान्त रहना चाहिये, परन्तु वह उत्तेजित हो जाए। शरीर का तापक्रम 98.4 डि.ग्री. फारेहनाईट रहना चाहिये, परन्तु वह बढ़ जाए अथवा कम हो जाए। शरीर में सभी अंगों एवं उपांगों का आकार निश्चित होता है, परन्तु वैसा न हो। विकास जिस अनुपात में होना चाहिये उस अनुपात में न हो। जैसे शरीर बेढंगा हो, शरीर में विकलांगता हो, आँखों की दृष्टि कमजोर हो, कान से कम सुनायी देता हो, मुँह से बराबर बोल न सके आदि शरीर की विभाव दशायें हैं, अतः रोग के प्रतीक हैं। शरीर का गुण है- जो अंग और उपांग शरीर में जिस स्थान पर स्थित होता है उनको वहीं स्थित रखना। हलन-चलन के बावजूद आगे पीछे न होने देना। शरीर में विकार उत्पन्न हो जाने पर उसको दूर कर पुनः अच्छा करना। यदि कोई हड्डी टूट जावे तो उसे पुनः जोड़ना। चोट लग जाने से घाव हो गया हो तो उसको भरना तथा पुनः त्वचा का आवरण लगाना। रक्त बहने अथवा रक्त-दान आदि से शरीर में रक्त की कमी हो गई हो तो उसकी पुनः पूर्ति करना। ये सब कार्य, गुण यानि शरीर के स्वभाव हैं। परन्तु यदि किसी कारणवश शरीर इन कार्यों को बराबर न करे तो यह उसकी विभावदशा होती है अर्थात् शारीरिक रोगों का प्रतीक है।

                शरीर विभिन्न तन्त्रों का समूह हैं। जैसे ज्ञानतन्त्र, नाड़ीतन्त्र, श्वसन, पाचन, विसर्जन, मज्जा, अस्थि, लासिका, शुद्धिकरण, प्रजनन तन्त्र आदि। सभी आपसी सहयोग से अपना-अपना कार्य स्वयं ही करते हैं, क्योंकि ये चेतनाशील प्राणी के लक्षण अथवा स्वभाव हैं। परन्तु यदि किसी कारणवश कोई भी तन्त्र शिथिल हो जाता है एवम् उसके कार्य को संचालित अथवा नियन्त्रित करने के लिये बाह्य सहयोग लेना पड़े तो यह शरीर की विभावदशा होती है। जो शारीरिक रोग का सूचक होता है।

                मन का कार्य मनन करना, चिन्तन करना, संकल्प-विकल्प करना, इच्छाएँ करना आदि होता है। इस पर जब ज्ञान एवम् विवेक का अंकुश रहता है तो वह शुभ में प्रवृत्ति करता है, व्यक्ति को नर से नारायण बनाता है। परन्तु जब स्वछन्द होता है तो अपने लक्ष्य से भटका देता है। जब चाहा, जैसा चाहा चिन्तन, मनन, इच्छा, एषणा, आवेग करने लग जाता है। जिसका परिणाम होता है- क्रोध, मान, माया, लोभ, असंयम, द्वन्द्व, प्रमाद, जैसी अशुभ प्रवृत्तियाँ। ये सब मानसिक रोगों के कारण होते हैं। इसके विपरीत क्षमा, करुणा, दया, मैत्री, सेवा, विनम्रता, सरलता, संतोष, संयम एवम् शुभ प्रवृत्तियां मन के उचित कार्य होते हैं। अतः मानसिक स्वस्थता के प्रतीक होते हैं। अज्ञान, मिथ्यात्व, मोह आत्मा की विभावदशा होती है, जो कर्मों के आवरण से उसको अपना भान नहीं होने देती, अतः आत्मा के रोग होते हैं। अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, वीतरागता शुद्धात्मा के लक्षण होते हैं जो आत्मा की स्वस्थता के द्योतक होते हैं। जैसे कोई व्यक्ति केवल झूठ बोलकर ही जीना चाहे, सत्य बोले ही नहीं, तो क्या दीर्घकाल तक अपना जीवन सुचारू रूप से चला सकता है? नहीं, क्योंकि झूठ बोलना आत्मा का स्वभाव नहीं है। व्यक्ति छोटा हो या बड़ा अपने स्वभाव में बिना किसी परेशानी के सदैव रह सकता है। बाह्य आलम्बनों एवम् परिस्थितियों में जितना-जितना वह विभाव अवस्था में जाएगा, शारीरिक, मानसिक अथवा आत्मिक रोगी बनता जाएगा। जितना-जितना अपने स्वभाव को विकसित करेगा, स्वस्थ बनता जाएगा। अपने आपको पूर्ण स्वस्थ रखने की कामना रखने वालों को इस तथ्य, सत्य का चिन्तन कर अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ना चाहिये।

Chordia Health Zone

Powerd By Webmitra