क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

96. स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका


स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका 

स्वास्थ्य हेतु सम्यक् चिन्तन आवश्यक-

हमारा शरीर हमारे लिए दुनियाँ की सर्वश्रेष्ठ निधि है। अमूल्य अंगों, उपांगों, इन्द्रियों, मन, मस्तिष्क और विभिन्न अवयवों द्वारा निर्मित मानव जीवन का संचालन और नियन्त्रण कौन करता है? यह आज भी वैज्ञानिकों के लिए शोध का विशय है। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विज्ञान के विकास एवं लम्बे-चौड़े दावों के बावजूद शरीर के लिए आवश्यक रक्त, वीर्य, मज्जा, अस्थि जैसे अवयवों का उत्पादन तथा अन्य अंगों, इन्द्रियों का निर्माण आज तक सम्भव नहीं हो सका। मानव शरीर में प्रायः संसार में उपलब्ध अधिकांश यंत्रों से मिलती-जुलती प्रक्रियाएँ होती है। मानव मस्तिष्क जैसा सुपर कम्प्यूटर, आँखों जैसा कैमरा, हृदय जैसा अनवरत चलने वाला पम्प, कान जैसी श्रवण व्यवस्था, आमाशय जैसा रासायनिक कारखाना आदि एक साथ अन्यत्र मिलना प्रायः बहुत दुर्लभ है। उससे भी आश्चर्यजनक बात तो यह है कि सारे अंग, उपांग, मन और इन्द्रियों के बीच आपसी तालमेल। यदि कोई तीक्ष्ण पिन, सुई अथवा काँच आदि शरीर के किसी भाग में चुभ जाए तो सारे शरीर में कंपकंपी हो जाती है। आँखों से आँसू और मुँह से चीख निकलने लगती है। शरीर की सारी इन्द्रियाँ एवं मन क्षण भर के लिए अपना कार्य रोक शरीर के उस स्थान पर केन्द्रित हो जाते हैं। उस समय न तो मधुर संगीत अच्छा लगता है और न ही मन-भावन दृष्य। न हँसी मजाक में मजा आता है और न खाना-पीना भी अच्छा लगता है। मन जो दुनियाँ भर में भटकता रहता है, उस स्थान पर अपना ध्यान केन्द्रित कर देता है। हमारा सारा प्रयास सबसे पहले उस चुभन को दूर करने में लग जाता है। जैसे ही चुभन दूर होती है, हम राहत का अनुभव करते हैं। जिस शरीर में इतना आपसी सहयोग, समन्वय, समर्पण, अनुशासन और तालमेल हो अर्थात् शरीर के किसी एक भाग में दर्द, पीड़ा और कष्ट होने की स्थिति में सारा शरीर प्रभावित हो तो क्या ऐसे स्वचलित, स्वनियन्त्रित, स्वानुशासित शरीर में असाध्य एवं संक्रामक रोग पैदा हो सकते हैं? चिन्तन का प्रश्न है।

                मानव जीवन अनमोल है, अतः उसका दुरुपयोग न करें। वर्तमान की उपेक्षा भविष्य में परेशानी का कारण बन सकती है। वास्तव में हमारे अज्ञान, अविवेक, असंयमित, अनियंत्रित, अप्राकृतिक जीवनचर्या के कारण जब शरीर की प्रतिकारात्मक क्षमता से अधिक शरीर में अनुपयोगी, विजातीय तत्त्व और विकार पैदा होते हैं तो शारीरिक क्रियाएँ पूर्ण क्षमता से नहीं हो पाती, जिससे धीरे-धीरे रोगों के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। अनेक रोगों की उत्पत्ति के पश्चात् ही कोई रोग हमें परेशान करने की स्थिति में आता है। उसके लक्षण प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट होने लगते हैं। शरीर में अनेक रोग होते हुए भी किसी एक रोग की प्रमुखता हो सकती है। अधिकांश प्रचलित चिकित्सा पद्धतियाँ, उसके आधार पर रोग का नामकरण, निदान और उपचार करती है। प्रायः रोग के अप्रत्यक्ष और सहयोगी कारणों की उपेक्षा के कारण उपचार आंशिक एवं अधूरा ही होता है। सही निदान के अभाव में उपचार हेतु किया गया प्रयास अधूरा ही होता है। जो कभी-कभी भविष्य में असाध्य रोगों के रूप में प्रकट होकर अधिक कष्ट, दुःख और परेशानी का कारण बन सकते हैं।

शरीर, मन एवं आत्मा की विकारमुक्त अवस्था ही सम्पूर्ण स्वस्थता का प्रतीक होती है-

जनसाधारण किसी बात को तब तक स्वीकार नहीं करता, जब तक उसे आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित और मान्य नहीं कर दिया जाता, परन्तु चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिक चिकित्सकों की सोच आज भी प्रायः शरीर तक ही सीमित होती है। मन एवं आत्मा के विकारों को दूर कर मानव को पूर्ण स्वस्थ बनाना उनके सामथ्र्य से परे है। फलतः आधुनिक चिकित्सा में प्राथमिकता रोगी के रोग से राहत की होती है और उसके लिए हिंसा, अकरणीय कर्म, अन्याय, अवर्जित, अभक्ष्य का विवेक उपेक्षित एवं गौण होता है। अतः ऐसा आचरण कभी-कभी प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों के विपरीत होने के कारण, उपचार अस्थायी, दुष्प्रभावों की सम्भावनाओं वाला भी हो सकता है। वास्तव में जो चिकित्सा शरीर को स्वस्थ, शक्तिशाली, ताकतवर, रोगमुक्त बनाने के साथ-साथ मन को संयमित, नियन्त्रित, अनुशासित और आत्मा को निर्विकारी, पवित्र एवं शुद्ध बनाती है- वे ही चिकित्सा पद्धतियाँ स्थायी प्रभावशाली एवं सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति होने का दावा कर सकती हैं।  

                चिकित्सा पद्धति की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता होती है, उसकी प्रभावशीलता, तुरन्त राहत पहुँचाने की क्षमता तथा दुष्प्रभावों से रहित स्थायी रोग मुक्ति। अतः जो चिकित्सा पद्धतियाँ जितनी ज्यादा स्वावलम्बी होती हैं, रोगी की उसमें उतनी ही अधिक सजगता, भागीदारी एवं सम्यक् पुरुषार्थ होने से वे प्रभावशाली ही होती हैं। अधिकांश चिकित्सा पद्धतियों का उद्देश्य मानव के शरीर को स्वस्थ रखने तक ही सीमित होता है। अतः उपचार करते समय हिंसा को बुरा नहीं मानते। स्वयं को तो एक पिन की चुभन भी सहन नहीं होती, परन्तु आज वीडियो, कम्प्यूटर और मोबाइल जैसे वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता होने के बावजूद शारीरिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए मूक, असहाय, बेकसूर जीवों का अनावश्यक विच्छेदन कर हिंसा करना, निर्मित दवाइयों के परीक्षणों हेतु जीव-जन्तुओं पर बिना रोक-टोक क्रूरतम हृदय विदारक यातनाएँ देना, मानव की स्वार्थी एवं अहं मनोवृति का प्रतीक है। भोजन में माँसाहार, अण्डों और मछलियों को पौष्टिक बतला कर प्रोत्साहन देना पाष्विकता का द्योतक है। किसी प्राणी को दुःख दिए बिना हिंसा, क्रूरता, निर्दयता हो नहीं सकती। जो प्राण हम दे नहीं सकते, उसको लेने का हमें क्या अधिकार है? दुःख देने से दुःख ही मिलेगा। प्रकृति के न्याय में देर हो सकती है, अँधेर नहीं। जो हम नहीं बना सकते, उसको स्वार्थवश नष्ट करना बुद्धिमता नहीं। अतः चिकित्सा के नाम पर प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से हिंसा करना, कराना और करने वालों को दवाओं के माध्यम से शरीर में जाने वाली उन बेजुबान प्राणियों की बद-दुवाएँ शरीर को दुष्प्रभावों से ग्रसित करें, तो आश्चर्य नहीं। अतः चिकित्सा की दूसरी प्राथमिकता होती है- अहिंसक उपचार। जिसके लिए हिंसा और अहिंसा के भेद को समझ अनावश्यक हिंसा से यथासम्भव बचना होगा। चिकित्सा पद्धतियाँ जितनी अधिक अहिंसा के सिद्धान्तों पर आधारित होती है वे शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा के विकारों को भी दूर करने में सक्षम होने के कारण शीघ्र, स्थायी एवं अत्यधिक प्रभावशाली होती हैं।

क्या शरीर के नियमित संचालन हेतु शरीर विज्ञान की विस्तृत जानकारी आवश्यक है?

                हम साल के 365 दिनों में अपने घरों में बिजली के तकनीशियन को प्रायः 8 से 10 बार से अधिक नहीं बुलाते। 355 दिन जैसे स्विच चालू करने की कला जानने वाला बिजली के उपकरणों का उपयोग आसानी से कर सकता है। उसे यह जानने की आवश्यकता नहीं होती कि बिजली का आविष्कार किसने, कब और कहाँ किया? बिजलीघर से बिजली कैसे आती है? कितना वोल्टेज, करेन्ट और फ्रिक्वेन्सी है? मात्र स्विच चालू करने की कला जानने वाला उपलब्ध बिजली का उपयोग कर सकता है। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की ऐसी साधारण जानकारी से व्यक्ति न केवल स्वयं अपने आपको स्वस्थ रख सकता है, अपितु असाध्य से असाध्य रोगों का बिना किसी दुष्प्रभाव प्रभावशाली ढंग से उपचार भी कर सकता है।

स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ क्यों प्रभावशाली?

                बिना दवा उपचार की स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ सहज, सरल,सस्ती, स्थायी, दुष्प्रभावों से रहित, शरीर की प्रतिकारात्मक क्षमता को बढ़ाने वाली होती हैं। जो व्यक्ति का स्वविवेक जागृत कर, स्वयं की क्षमताओं के सदुपयोग की प्रेरणा देती है। वे हिंसा पर नहीं अहिंसा पर, विषमता पर नहीं समता पर, साधनों पर नहीं साधना पर, दूसरों पर नहीं स्वयं पर, क्षणिक राहत पर नहीं, अपितु अन्तिम प्रभावशाली स्थायी परिणामों पर आधारित होती हैं। रोग के लक्षणों की अपेक्षा रोग के मूल कारणों को नष्ट करती हैं जो शरीर के साथ-साथ मन एवं आत्मा के विकारों को दूर करने में सक्षम होती हैं। जो जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उसको उसकी क्षमता के अनुरूप महत्त्व एवं प्राथमिकता देती हैं। यह प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों पर आधारित होने के कारण अधिक प्रभावशाली, वैज्ञानिक, मौलिक एवं निर्दोष होती हैं।

Chordia Health Zone

Powerd By Webmitra