क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

10. इलास्टिक डोरी द्वारा असाध्य रोगों का सरलतम उपचार


 मानव शरीर दुनियां की सर्वश्रेष्ठ मशीन होती है, जिसमें शरीर को स्वयं स्वस्थ रखने की क्षमता होती है। हमें चिन्तन करना होगा कि जो शरीर अपनी कोशिकाएँ, रक्त, मांस, मज्जा, हड्डियों, चर्बी, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण स्वयं करता है, ऐसे स्वचालित, स्वनिर्मित, स्वनियन्त्रित शरीर में स्वयं के रोग को दूर करने की क्षमता न हो,  कैसे संभव है?

शारीरिक लक्षणों पर आधारित रोग का निदान अपूर्ण-

                हमारे शरीर में प्रायः सैकड़ों रोग होते हैं। जिनकी उपस्थिति का हमें आभास तक नहीं होता है। हम तब तक रोग को रोग नहीं मानते, जब तक उनके लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं हो जाते या हमें परेशान करने नहीं लग जाते अथवा रोग हमारी सहनशक्ति से परे नहीं होने लगता है। रोग के जो लक्षण बाह्य रूप से प्रकट होते हैं, अथवा पेथालोजिकल टेस्टों एवं यंत्रों की पकड़ में आते हैं, वे लक्षण तो सामान्य ही होते हैं, जिनके आधार पर प्रायः रोगों का नामकरण किया जाता है।

                शरीर में जितने रोग अथवा उनके कारण होते हैं उतने हमारे ध्यान में नहीं आते। जितने ध्यान में आते हैं, उतने हम अभिव्यक्त नहीं कर सकते। जितने रोगों को अभिव्यक्त कर पाते हैं, वे सारे के सारे चिकित्सक अथवा अति आधुनिक समझी जाने वाली मशीनों की पकड़ में नहीं आते। जितने लक्षण स्पष्ट रूप से उनकी समझ में आते हैं, उन सभी का वे उपचार नहीं कर पाते। परिणाम स्वरूप जो लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं, उनके अनुसार आज रोगों का नामःकरण किया जा रहा है, तथा अधिकांश प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों का ध्येय उन लक्षणों को दूर कर रोगों से राहत पहुंचाने मात्र का होता है। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियां और उनमें कार्यरत चिकित्सक आज असाध्य एवं सक्रामक रोगों के उपचार के जो बड़े-बड़े दावे और विज्ञापन करते हैं, वे कितने भ्रामक, अस्थायी होते हैं, जिस पर पूर्वाग्रह छोड़कर सम्यक् चिंतन करना आवश्यक हैं। जब निदान ही अधूरा हो, अपूर्ण हो तब प्रभावशाली उपचार के दावे छलावा नहीं तो क्या हैं?  जनतंत्र में सहयोगियों को अलग किये बिना जिस प्रकार नेता को नहीं हटाया जा सकता, सेना को जीते बिना सेनापति को कैद नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार सहयोगी रोगों की उपेक्षा कर शरीर को पूर्ण रूप से रोग मुक्त नहीं रखा जा सकता। यह सनातन सत्य है तथा उसको नकारने एवं उपेक्षा करने वाली चिकित्सा आंशिक, अधूरी एवं अस्थायी ही होती है।

निदान एवं उपचार के विभिन्न सिद्धांत-

                रोग की अवस्था में आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार शरीर में वात, पित्त और कफ का असन्तुलन होने लगता है। आधुनिक चिकित्सक को मल, मूत्र, रक्त आदि के परीक्षणों में रोग के लक्षण और शरीर में रोग के कीटाणुओं तथा वायरस दृष्टिगत होने लगते हैं। प्राकृतिक चिकित्सक ऐसी स्थिति से शरीर के निर्माण में सहयोगी पंच तत्त्व-पृथ्वी, पानी, हवा, अग्नि और आकाश का असन्तुलन अनुभव करते हैं। चीनी एक्यूपंक्चर एवं एक्युप्रेशर के विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में यिन-यांग का असंतुलन हो जाता है। एक्युप्रेशर के प्रतिवेदन बिन्दुओं की मान्यता वाले थेरेपिष्टों को व्यक्ति की हथेली और पगथली में विजातीय तत्त्वों का जमाव प्रतीत होने लगता है। सुजोक बायल मेरेडियन सिद्धान्तानुसार रोगी के शरीर में पंच ऊर्जाओं (वायु, गर्मी, ठण्डक, नमी और शुष्कता) का आवश्यक सन्तुलन बिगड़ने लगता है। चुम्बकीय चिकित्सक शरीर में चुम्बकीय ऊर्जा का असन्तुलन अनुभव करते हैं। ज्योतिश शास्त्री ऐसी परिस्थिति का कारण प्रतिकूल ग्रहों का प्रभाव बतलाते हैं। आध्यात्मिक योगी ऐसी अवस्था का कारण पूर्वार्जित अशुभ असाता वेदनीय कर्मों का उदय मानते हैं। होम्योपेथ और बायोकेमिस्ट की मान्यतानुसार शरीर में आवश्यक रासायनिक तत्त्वों का अनुपात बिगड़ने से ऐसी स्थिति उत्पन्न होने लगती है। आहार विशेषज्ञ शरीर में पौष्टिक तत्त्वों का अभाव बतलाते हैं। शरीर में अम्ल-क्षार, ताप-ठण्डक का असन्तुलन बढ़ने लगता है। कहने का आषय यही है कि विभिन्न चिकित्सा पद्धतियाँ अपने-अपने सिद्धान्तों के अनुसार शरीर में इन विकारों की उपस्थिति को रोग अथवा अस्वस्थता का कारण मानते हैं। जो जैसा कारण बतलाता है, उसी के अनुरूप उपचार और परहेज रखने का परामर्श देते हैं। सभी को आंशिक सफलताएँ भी प्राप्त हो रही है तथा सफलताओं एवं अच्छे परिणामों के लम्बे-लम्बे दावे अपनी-अपनी चिकित्सा पद्धतियों के सुनने को मिल रहे हैं। विज्ञान के इस युग में किसी पद्धति को बिना सोचे-समझे अवैज्ञानिक मानना, न्याय-संगत नहीं कहा जा सकता।

                आज उपचार के नाम पर रोग के कारणों को दूर करने के बजाय अपने-अपने सिद्धान्तों के आधार पर रोग के लक्षण मिटाने का प्रयास हो रहा है। उपचार में समग्र दृष्टिकोण का अभाव होने से तथा रोग का कारण पता लगाये बिना उपचार किया जा रहा है। अर्थात् रोग से राहत ही उपचार का लक्ष्य बनता जा रहा है।

सम्पूर्ण निदान की प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति एक्युप्रेशर-

                सुजोक और रिफ्लेक्सोलाॅजी एक्युप्रेशर के सिद्धान्तानुसार हथेली और पगथली में दबाव देने पर जिन स्थानों पर दर्द होता है, उसका मतलब उन स्थानों पर विकार अथवा अनावश्यक विजातीय तत्त्वों का जमाव हो जाना होता है। परिणाम स्वरूप शरीर में प्राण ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध हो जाता है। इन प्रतिवेदन बिन्दुओं पर विजातीय तत्त्वों के जमा होने से संबंधित अंग, उपांग, अवयवों आदि में प्राण ऊर्जा के प्रवाह में असंतुलन हो जाने से व्यक्ति रोगी बनने लगता है। अतः यदि किसी भी विधि द्वारा यदि इन विजातीय तत्त्वों को वहाँ से हटा दिया जावे तो प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने लगता है जिससे रोग के कारण दूर होने से शरीर के संबंधित अंग-उपांग एवं अवयव रोग मुक्त होने लगते हैं। परन्तु आज एक्युप्रेशर द्वारा उपचार करने वाले चिकित्सक भी निदान के मूल सिद्धान्तों से हट कर मात्र रोग से प्रत्यक्ष प्रभावित अंगों के प्रतिवेदन बिन्दुओं का उपचार हेतु निर्धारण करते हैं। सीमित प्रतिवेदन बिन्दुओं पर उपचार करने से प्रभावशाली एक्युप्रेशर का प्रभाव भी सीमित हो जाता है। किसी भी चिकित्सक के पास इतना समय नहीं होता कि रोगी के सभी प्रतिवेदन बिन्दुओं का ढंग से निदान कर सके।  वे तो मात्र मुख्य प्रतिवेदन बिन्दुओं तक ही अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं, अतः उपचार आंशिक ही कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि दोनों हथेलियों एवं पगथली के समस्त प्रतिवेदन बिन्दुओं से विजातीय तत्त्वों को किसी विधि द्वारा अलग कर दिया जावे तो न केवल मुख्य रोग अपितु सभी अप्रत्यक्ष सहयोगी रोग भी दूर हो जाने से पूरा शरीर स्वस्थ हो जाता है।

इलास्टिक डोरी द्वारा पूर्ण शरीर का प्रभावशाली उपचार-

                उपचार हेतु इलास्टिक डोरी से हथेली और पगथली के अंगूठों एवं अंगुलियों को बारी-बारी से अपनी सहन शक्ति के अनुसार कसकर (टाईट) लपेटकर रखें और उसके बाद खोल दें। जैसे ही डोरी अंगुलियों/अंगूठे से हटाते हैं उस पर दबाव हटने से वहाँ पर प्राण ऊर्जा तीव्र गति से प्रवाहित होने लगती है। परिणामस्वरूप वहाँ पर जमे हुए विजातीय तत्त्व अपना स्थान छोड़ने लगते हैं। डोरी खोलने के पश्चात् उस भाग की हथेली से मसाज कर लें ताकि वहाँ रक्त का संचार भी बराबर होने लगता है। जैसे-जैसे विजातीय तत्त्व दूर होते हैं संबंधित अंग, उपांग एवं अंगों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने से वे रोग मुक्त होने लगते हैं। अंगुलियों एवं अंगूठों की भांति हथेली और पगथली के शेष भाग में डोरी द्वारा उपचार करने से पूरे शरीर अर्थात् प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी रोगों का उपचार किया जा सकता है।

                उपचार में ही निदान एवं रोकथाम शामिल होते हैं। उपचार का प्रभाव डोरी की इलास्टिक एवं व्यक्ति के दबाव की सहन शक्ति पर निर्भर करता है। यदि व्यक्ति की सहनशक्ति बराबर न हो तो उपचार बार-बार सहनीय दबाव देकर किया जा सकता है। उपचार में रोगी की भागीदारी मुख्य होती है। यदि स्वस्थ व्यक्ति उपरोक्त उपचार नियमित रूप से करे तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जायेगी। शरीर के सभी तन्त्र संतुलित रूप से अपना कार्य करने लगेगे जिससे रोग उत्पन्न होने की संभावनाएँ कम हो जायेगी तथा उसकी कार्य क्षमता बढ़ जायेगी।

                उपरोक्त उपचार बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित, गरीब-अमीर, शरीर विज्ञान की जानकारी न रखने वाला व्यक्ति भी पूर्ण आत्मविश्वास, बिना किसी दूसरे के आश्रित रहते हुए स्वयं कर सकता है। उपचार बहुत ही सरल, सस्ता, स्वावलंबी, प्रभावशाली, दुष्प्रभावों से रहित, अहिंसक एवं वैज्ञानिक, प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों पर आधारित होता है। पूर्ण शरीर का उपचार होने से अर्थात् सहयोगी रोगों की उपेक्षा न होने से चंद दिनों के उपचार से न केवल रोगों में राहत ही, अपितु रोग से स्थायी मुक्ति हो सकती है।

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