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स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

18. पंच तत्त्वों को संतुलित करने का प्रभावशाली उपाय हस्त मुद्राएँ


शरीर में हथेली प्रमुख सक्रिय भाग:-

                हस्त योग मुद्राओं द्वारा पंच तत्त्वों को सरलता से संतुलित किया जा सकता है। ये मुद्राएँ शरीर में चेतना के शक्ति केन्द्रों में रिमोट कण्ट्रोल के समान स्वास्थ्य रक्षा और रोग निवारण करने में प्रभावशाली कार्य करती है। जिससे मानव भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति की तरफ अग्रसर होता है।

मुद्रा विज्ञान:- हाथ की पाँचों अंगुलियों का सम्बन्ध पंच महाभूत तत्त्वों से होता है। प्रत्येक अंगुली अलग-अलग तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है। जैसे- कनिष्ठिका  जल तत्त्व से, अनामिका पृथ्वी तत्त्व से, मध्यमा अग्नि तत्त्व से, तर्जनी वायु तत्त्व से और अंगुठा आकाश तत्त्व से। परन्तु बहुत से योगी अंगूठे को अग्नि और मध्यमा को आकाश तत्त्व का प्रतीक मानते हैं। परन्तु ऐसा इसलिए उचित नहीं लगता क्योंकि आकाश तत्त्व ही सभी तत्त्वों को आश्रय देता है, उसके सहयोग के बिना किसी भी तत्त्व का अस्तित्त्व नहीं रहता। ठीक उसी प्रकार अंगूठे से ही अन्य सभी अंगुलियों का स्पर्श हो सकता है, मध्यमा से नहीं। दूसरी बात मस्तिष्क में आकाश तत्त्व की प्रधानता होती है। अंगूठा मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है। सुजोक एक्युप्रेशर में मस्तिष्क के रोगों का उपचार अंगूठे से ही किया जाता है।

                मुद्रा विज्ञान के अनुसार हमारी अंगुलियाँ ऊर्जा का नियमित स्रोत होने के साथ-साथ एन्टीना का कार्य भी करती है। शरीर में पंच तत्त्वों की घटत-बढ़त से व्याधियाँ होती हैं। अंगुलियों एवं अंगूठे को मिलाने, दबाने, स्पर्श करने, मोंड़ने तथा विशेष आकृति में कुछ समय तक बनाए रखने से शरीर में तत्त्वों के अनुपात में परिवर्तन किया जा सकता है। उसका स्नायु मण्डल और यौगिक चक्रों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। अंगुलियों को अनावश्यक मोड़ने एवं चटखने से शक्ति का अपव्यय होता है।

                अंगूठे को तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका के मूल में लगाने से उस अंगुलि से सम्बन्धित तत्त्व की विशेष वृद्धि होती है। अंगुलियों के प्रथम पौर में स्पर्श करने से तत्त्व सन्तुलित होता है तथा इन अंगुलियों को अंगूठे के मूल पर स्पर्श कर अंगूठे से दबाने से उस तत्त्व की कमी होती है। इस प्रकार विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से पंच तत्त्वों को इच्छानुसार घटाया अथवा बढ़ाकर संतुलित किया जा सकता है। हथेली में अंगुलियों एवं अंगूठों की अलग स्थितियों द्वारा अलग-अलग मुद्राऐं बनती है, जो पंच तत्त्वों को संतुलित कर साधक को स्वस्थ रखने में सहयोग करती है।

                रोग से संबन्धित मुद्राएँ रोग दूर होने के समय तक ही करनी चाहिए। परन्तु अन्य मुदाएँ स्वेच्छानुसार जितनी अधिक की जाती हैं, उतना अधिक लाभ मिलता है। रोग जितना पुराना होता है, उसके उपचार में उतना ही अधिक समय लग सकता है। फिर भी अंशकालीन मुद्रा प्रयोग स्नायुमण्डल के केन्द्रों और मुख्य ऊर्जा चक्रों में प्रभावशाली कंपन उत्पन्न करने में सहायक होती है।

चन्द प्रमुख मुद्राएँ

                हथेली की अंगुलियों और अंगूठे की विविध स्थितियों से अलग-अलग मुद्राएँ बनती है। प्रत्येक मुद्रा का प्रभाव अलग-अलग होता है और इन मुद्राओं से शरीर में उपस्थित पंच महाभूत तत्त्व प्रभावित होते हैं। अतः अलग-अलग मुद्राओं द्वारा उन्हें सन्तुलित रख स्वस्थ रहा जा सकता है।

                मुद्राएँ कभी भी किसी भी आसन में की जा सकती है, फिर भी स्वस्थ व्यक्ति को यथा संभव वज्रासन अथवा पद्मासन में करना अधिक प्रभावशाली होता है। परन्तु यदि ऐसा संभव न हो तो रोगी सोते-सोते भी इन मुद्राओं को कर सकता है। मुद्रा एक हाथ में अथवा दोनों हाथों में की जा सकती है। मुद्राओं के नियमित अभ्यास से शरीर की ऊर्जा बढ़ती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

                कुछ मुद्राएँ रोग की अवस्था में ही की जाती है, तो पंच तत्त्वों को सम करने वाली ऊर्जाएँ कभी भी की जा सकती है। यहाँ पर चन्द विशेष मुद्राओं की सामान्य उपयोगी जानकारी ही दी जा रही है। जिज्ञासु व्यक्ति मुद्रा विशेषज्ञों से सम्पर्क कर मुद्रा विज्ञान को सरलता से अनुभूत कर अपने आपको स्वस्थ रख सकते हैं। कुछ मुद्राएँ तत्काल अपना प्रभाव डालती है। जैसे अपान वायु और शून्य मुद्रा। कुछ मुद्राएँ दीर्घकालिक होती है, जो लम्बे समय के अभ्यास के पश्चात् अपना स्थायी प्रभाव प्रकट करती है।

ज्ञान मुद्रा:-

                अंगुष्ठ व तर्जनी के ऊपरी पौर को स्पर्श करने से जहाँ हल्का सा नाड़ी स्पन्दन हो, ज्ञान मुद्रा बनती है। हाथ की अलग-अलग स्थिति रखने से ज्ञान मुद्राओं का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है, जिन्हें अलग-अलग प्रवृत्तियाँ करते समय आवश्यकतानुसार किया जा सकता है।

                ज्ञान मुद्रा से मस्तिष्क संबंधी रोग, आलस्य, घबराहट, चिड़चिड़ापन, क्रोध, निराशा, तनाव, अनिद्रा, बैचेनी, ज्ञान, तन्तु के विकार दूर होते हैं तथा स्मरण शक्ति बढ़ती है। मुद्रा से आभा मण्डल आकर्षक बनता है और आत्म विकार दूर होते हैं। ज्ञान मुद्रा अधिक से अधिक समय तक की जा सकती है।

                जब ज्ञान मुद्रा में दोनों हथेलियाँ कन्धे के बराबर सामने की तरफ होती है तो, व्यक्ति में निर्भयता आने से उस मुद्रा को ‘अभय मुद्रा’कहते हैं। जब दायाँ हाथ हृदय के पास और बायाँ घुटने के ऊपर रख जब ज्ञान मुद्रा की जाती है तो उसे ‘योग मुद्रा’अथवा ‘वैराग्य मुद्रा’कहते हैं।

वायु मुद्रा:-

                अंगुष्ठ से तर्जनी को दबाने से वायु मुद्रा बनती है जो शरीर में वायु के बढ़ने से होने वाले रोगों का शमन करती है, जैसे शरीर का कम्पन्न, जोड़ों का दर्द, गंठिया, रीढ़ की हड्डी संबंधी दर्द, वात रोग, लकवा आदि के समय करने से रोगों में राहत मिलती है।

आकाश मुद्रा:-

                अंगुष्ठ के ऊपरी पौर को मध्यमा के ऊपरी पौर से स्पर्श करने से आकाश मुद्रा बनती है। इससे अग्नि तत्त्व संतुलित होता है। हड्डियां मजबूत होती है। मुख का तेज ओर कान्ति सुधरती है। विचार क्षमता बढती है। श्रवण शक्ति ठीक रहती है एवं कान के रोग ठीक होते हैं। मानसिक संकीर्णता कम होती है। हृदय रोग में भी यह मुद्रा प्रभावकारी होती है। मानसिक एवं शारीरिक विकलांगता के लिए यह मुद्रा बहुत अच्छी है।

शून्य मुद्रा:-

                मध्यमा के ऊपरी पौर को अंगुष्ठ के मूल पर स्पर्श कर अंगुष्ठ से दबाकर बाकी अंगुलियाँ सीधी रखने से बनती है। इस मुद्रा से शरीर में मणिपुर चक्र से विशुद्धि तक के सभी चक्र प्रभावित होते हैं। बहरापन, गले के रोग,कान का दर्द, हिचकी, गूंगापन, सिर दर्द, विचार एवं शारीरिक शून्यता दूर होती है। काम वासना नियन्त्रित होती है। मूत्रावरोध दूर होता है। रक्त संचार सुधरता है।

पृथ्वी मुद्रा:-

                अंगुष्ठ को अनामिका के ऊपरी पौर से स्पर्श से यह मुद्रा बनती है। पृथ्वी तत्त्व सन्तुलित होने से शरीर की ताकत और पैरों की शक्ति बढ़ती है। हड्डियां एवं मांसपेशियाँ शक्तिशाली होती है। रक्त की कमी दूर होती है। नाभि के आसपास स्थित प्रायः सभी  अंगों से संबंधित रोगों में लाभ होता है। भूख नियन्त्रित होती है।

सूर्य मुद्रा:-

                अनामिका के ऊपरी पौर को अँगूठे के मूल पर रख कर अंगूठे से दबाने पर यह मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से मोटापा व भारीपन घटता है। मानसिक तनाव में कमी आती है। सर्दी एवं जल तत्त्व की अधिकता वाले उल्टिये, दस्तें संबंधित रोग ठीक होते हैं। नेत्र ज्योति बढ़ती है और प्रारम्भिक स्तर का मोतियाबिन्द भी ठीक होता है। पाचन क्रिया ठीक होती है जिससे कोलस्ट्रोल भी कम होता है।

जल मुद्रा (वरुण मुद्रा):-

                अंगुष्ठ का कनिष्ठ अंगुलि के ऊपरी पौर पर स्पर्श करने से यह मुद्रा बनती है। कनिष्ठिका जो शरीर में जल तत्त्व का संतुलन करती है। जल तत्त्व की कमी से होने वाले रोगों में जैसे- मांसपेशियों में खिचांव, चर्म रोग, शरीर में रुक्षता आदि ठीक होते हैं। रक्त शुद्धि और त्वचा में स्निग्धता लाने के लिए वरुण मुद्रा लाभदायक होती है। लूं नहीं लगती। बाईटों (Cremp) में इस मुद्रा से तुरन्त आराम मिलता है। आकस्मिक दुर्घटना में इस मुद्रा से चमत्कारी लाभ होता है।

जलोदर नाशक मुद्रा:-

                कनिष्ठिका को पहले अंगूठे की जड़ से लगा कर फिर अंगूठे से कनिष्ठिका को दबाने से जलोदर नाशक मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से शरीर से जल की वृद्धि से होने वाले रोग ठीक होते हैं। जैसे फेफड़ों अथवा पेट में पानी भरना, शरीर के किसी भाग में सूजन, नाक से पानी आना, आंखों से पानी आना, मुंह से लार टपकना आदि। शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलने लगते है, जिससे शरीर निर्मल बनता है, पसीना आता है, मूत्रावरोध ठीक होता है।

प्राण मुद्रा:-

                कनिष्ठिका और अनामिका के ऊपरी पौर को अंगूठे के ऊपरी पौर से स्पर्श करने से यह मुद्रा बनती है, जो जल और पृथ्वी तत्त्व को शरीर में सन्तुलन करने में सहयोग करती है।

                इस मुद्रा से चेतना शक्ति जागृत होती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। भूख प्यास सहन हो जाती है। रक्त संचार सुधरता है। आँखों के रोगों में राहत मिलती है। नेत्र ज्योति सुधरती है। हस्त रेखा विज्ञान के अनुसार सूर्य की अंगुलि अनामिका समस्त प्राणशक्ति का केन्द्र मानी जाती है। बुद्ध की अंगुलि कनिष्ठिका युवा शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। अतः इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में प्राण शक्ति का संचार तेज होता हैं रक्त संचार ठीक होने से रक्त नलिकाओं का अवरोध दूर होता है। साधक को भूख प्यास की तीव्रता नहीं सताती। थकावट दूर होती है। वाक् शक्ति सुधरती है।

अपान मुद्रा:-

                मध्यमा और अनामिका अंगुली के सिरे को अंगूठे के सिरे से स्पर्श करने से बनती है। इस मुद्रा से शरीर से विभिन्न प्रकार के विजातीय तत्त्वों की विसर्जन क्रिया नियमित होती है, ताकि अनावश्यक, अनुपयोगी पदार्थ सरलता पूर्वक शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

                इससे पेट में वायु का नियन्त्रण होने से पेट संबंधी वात रोगों में विशेष लाभ होता है। इस मुद्रा से मूत्राशय की कार्य प्रणाली सुधरती है। गुर्दो के रोग, कब्ज और बवासीर में यह मुद्रा विशेष लाभ दायक होती है। यह मुद्रा दांतों को भी स्वस्थ रखती है। इस मुद्रा से पसीना नियमित ढंग से आने लगता है। शरीर में प्राण और अपान वायु संतुलित होती है।

अपान वायु मुद्रा:-

                इस मुद्रा को मृत संजीवनी मुद्रा भी कहते है। तर्जनी को अंगुष्ठ के मूल से स्पर्श कर अंगूठे का अग्रभाग मध्यमा और अनामिका के ऊपरी पौर से स्पर्श करने व कनिष्ठिका को सीधी रखने से बनती है। इस मुद्रा से हृदयघात, हृदय रोग, हृदय की कमजोरी धड़कन, प्राण ऊर्जा की कमी, उच्च रक्त चाप, सिर दर्द, बैचेनी, पेट की गैस, घबराहट दूर होती है। दिल का दौरा पड़ने पर यह मुद्रा इंजेक्शन के समान तुरन्त प्रभाव दिखलाती है। हृदय के रोगियों को सीढ़िया चढ़ते समय यदि श्वास फूलता हो तो सीढ़िया चढ़ने से पूर्व 10-15 मिनट इस मुद्रा को करने से श्वास नहीं फूलता। हिचकी, दमा एवं दांतों के दर्द में आराम मिलता है। भोजन करते समय यदि भोजन का अंश श्वास नली में चला जाए तो तुरन्त राहत दिलाती है।

शंख मुद्रा:-

                बांये हाथ के अंगूठे को दांये हाथ की मुट्ठी में बन्द कर बांये हाथ की तर्जनी को दाहिने हाथ के अँगूठे से मिला, बाकी तीनों अंगुलियों को मुट्ठी के ऊपर रखने से शंख मुद्रा बनती है।

                इस मुद्रा से वाणी संबंधी रोग जैसे तुतूलाना, आवाज में भारीपन गले के रोग और थायरायड संबंधी रोगों में विशेष लाभ होता है। भूख अच्छी लगती है। वज्रासन में बैठकर यह मुद्रा करने से अधिक प्रभावकारी हो जाती है। हृदय के पास इस मुद्रा को हथेलियाँ रख कर करने से हृदय रोग में शीघ्र लाभ होता है। रक्त चाप कम होने लगता है।

लिंग मुद्रा:-

                दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर दायें अंगूठे को ऊपर खड़ा रखने से यह मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से शरीर में गर्मी बढ़ती है। मोटापा कम होता है। कफ, नजला, जुकाम, खांसी, सर्दी संबंधी रोगों, फेंफड़ों के रोग, निम्न रक्तचाप आदि में कमी, होती है। इस मुद्रा से शरीर में मौसम परिवर्तन से होने वाले सर्दी जन्य रोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

मुद्राओं के मार्ग दर्शन सिद्धान्त-

                मुद्राओं का अभ्यास बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी कर सकते हैं। मुद्राओं को चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते जब चाहें कर सकते हैं। परन्तु शान्त एकान्त स्थान पर एकाग्रचित से मुद्राएँ करने पर विशेष लाभ होता है। अपनी-अपनी आवश्यकताओं के अनुसार सही मुद्राओं का अभ्यास करने से चमत्कारिक लाभ होता है।

                नियमित और निश्चित समय पर प्राणायाम के पश्चात् ध्यान के आसन में बैठ एकाग्र चित्त से दोनों हाथों में करने से तुरन्त लाभ होता है। कुछ विशेष मुद्राओं को छोड़ मुद्राएँ किसी भी अवस्था में की जा सकती है। रोग के समय लेटे-बैठे, चलते-फिरते अथवा बातचीत करते हुए मुद्राएँ की जा सकती है। अधिकांश मुद्राएँ कम-से-कम एक घड़ी अर्थात् 48 मिनट लगातार करनी चाहिए। जिससे उसका उपेक्षित लाभ प्राप्त हो सके।

                रोग से सम्बन्धित मुद्राएँ रोग दूर होने के समय तक ही करनी चाहिए। परन्तु अन्य मुद्राएँ स्वेच्छानुसार जितनी अधिक की जाती हैं, उतना अधिक लाभ मिलता है। रोग जितना पुराना होता है, उसके उपचार में उतना ही अधिक समय लग सकता है। फिर भी अंशकालीन मुद्रा प्रयोग स्नायुमण्डल के केन्द्रों और मुख्य ऊर्जा चक्रों में प्रभावशाली कंपन उत्पन्न करने में सहायक होती है।

                बांये हाथ से जो मुद्रा की जाती है, उसका प्रभाव दाहिने अंगों पर विशेष पड़ता है और दांये हाथ से जो मुद्राएँ की जाती है, उसका प्रभाव बांये भाग के अंगों पर विशेष पड़ता है। शरीर के आवश्यकतानुसार एक के बाद एक मुद्रा की जा सकती है। मुद्राएँ यथासम्भव दोनों हाथों से करनी चाहिए। मुद्रा करते समय अंगुलियों का स्पर्श हल्का और सहज होना चाहिए तथा जो अंगुलियाँ मुद्रा बनाने में काम आती, उन्हें सीधा ही रखना चाहिए। अन्य उपचारों के साथ भी मुद्राओं का उपयोग किया जा सकता है।

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