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स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

20. प्रभावशाली नमस्कार मुद्रा


दोनों हाथों की हथेलियों की पाँचों अंगुलियों से कोहनी तक के भाग को स्पर्श करने से नमस्कार मुद्रा बनती है। हथेली में सुजोक एवं हैण्ड रिफ्लेक्सोलाॅजी एक्यूप्रेशर के सिद्धान्तानुसार शरीर के प्रत्येक भाग के प्रतिवेदन बिन्दु होते हैं और जब दोनों हथेलियों को मिलाते हैं तो हथेली के चारों तरफ का आभा मंडल संतुलित होने लगता है, जिससे सभी अंगों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने लगता है, आवेग शांत होने लगते हैं। मन की चंचलता शांत होती है, श्वास की गति मंद हो जाती है। जिससे अहं  का विसर्जन एवं क्रोध शांत होता है। सकारात्मक सोच विकसित होने लगती है। इसी कारण हमारे यहाँ एक लोकोक्ति है- ‘हाथ जोड़ो - गुस्सा छोड़ो’ अर्थात् हाथ जोड़कर क्रोध नहीं किया जा सकता।

                दोनों हाथों को मिलाने से चन्द्र और सूर्य स्वर सम होने लगता है और सुषुन्ना स्वर चलने लगता है। सिद्धान्तानुसार फलतः वात, कफ और पित्त आदि विकारों पर अंकुश लगने लगता है। आयुर्वेद के अनुसार वात-कफ एवं पित्त के असंतुलन से ही रोगों की उत्त्पति होती हैं।

                ज्योतिष में रेखा विज्ञान के अनुसार हथेली में व्यक्ति के सम्पूर्ण ग्रहों की स्थिति होती है। हस्त रेखा विशेषज्ञ हथेली का आकार एवं विभिन्न रेखाओं की स्थिति देखकर मनुष्य के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं को बताने में सक्षम होते हैं। जब दोनों हथेलियों को आपस में मिलाते हैं तो अशुभ ग्रहों का प्रभाव कम होने लगता है। हथेली की अंगुलियों में तरह-तरह के रत्न एवं विशिष्ट पत्थर अंगूठियों में पहनने से रत्न चिकित्सा के सिद्धान्तानुसार उन रत्नों की तरंगों का प्रभाव सभी स्तर पर पड़ने लगता है। जिससे न केवल रोगों का उपचार होता है अपितु प्रतिकूल ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति को भी नियन्त्रित किया जा सकता है।

                हथेली की पाँचों अंगुलियाँ पंच महाभूत तत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का प्रतिनिधित्व करती है। अतः नमस्कार मुद्रा से बायें-दायें पंच तत्त्वों का संतुलन होने लगता है। पंच तत्त्वों का असंतुलन ही अधिकांश रोगों का मूल कारण होता है। मुद्रा-साधक हाथों की अंगुलियों और अंगूठों को अलग-अलग ढंग से आपस में निश्चित समय तक स्पर्श कर पंच महाभूत तत्त्वों को संतुलित कर विभिन्न रोगों का उपचार करते हैं।

                धातु विशेषज्ञ अलग-अलग ग्रहों की शांति के लिए हथेली की अंगुलियों में सोने, चाँदी, तांबें, लोहे जैसी अलग-अलग धातुओं की बनी अंगूठियों में अलग-अलग रत्नों को पहनने पर जोर देते हैं।

                नाखूनों की बनावट एवं उनके रंगों के आधार पर मनुष्य के स्वभाव के बारे में जाना जा सकता है।

                नमस्कार मुद्रा से पिरामिड का आकार बनता है जिससे डायाफ्राम के ऊपर का भाग ऊर्जा का सक्रिय क्षेत्र बनने लगता है। आभा मण्डल शुद्ध होने लगता है। अशुभ सोच शुभ में बदलने लगती है।

                चीनी पंच तत्त्व सिद्धान्तानुसार हृदय, फेंफड़े, पेरीकार्डियन (मस्तिष्क) मेरेडियन एवं उसके सहयोगी पूरक अंग छोटी आंत, बड़ी आंत, ट्रिपल वार्मर (मेरुदण्ड) की पाँच प्रमुख ऊजाओं (वायु, ताप, नमी, शुष्कता एवं ठण्डक) के मुख्य प्रतिवेदन बिन्दु हथेली और कोहनी के बीच होते हैं। मेरेडियन की दायें और बायें शरीर में समान स्थिति होने से उनमें प्रवाहित ऊर्जाओं का असंतुलन रोगों का मुख्य कारण होता है। परन्तु नमस्कार मुद्रा द्वारा जब दोनों हथेलियों से कोहनी तक के भाग को आपस में मिलाया जाता है तो इन मेरेडियनों में पाँचों ऊर्जाओं का संतुलन होने लगता है। परिणामस्वरूप शरीर में दायें-बायें संतुलन होने लगता है। रक्त चाप सामान्य हो जाता है। श्वसन तंत्र बराबर कार्य करने लगता  है। इस मुद्रा से डायाफ्राम के ऊपर स्थित हृदय, फेंफड़े और मस्तिष्क संबंधी सभी रोगों में विशेष लाभ होता है। हाथों एवं कंधों के रोगों में तो इस मुद्रा के चमत्कारिक परिणाम आते हैं।

                हथेली की अंगुलियों में प्राण ऊर्जा का विशेष प्रवाह होता हैं। इसी कारण रेकी, प्राणिक हीलिंग द्वारा उपचार एवं आशीर्वाद हथेली से ही दिया जाता है। आभा मंडल के फोटोग्राफ्स से इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।

                वैसे तो अधिकांश मुद्राओं को लगभग 48 मिनट करने से पूर्ण लाभ प्राप्त होता है। रोग की अवस्था में साधारण लगने वाली इस मुद्रा के करने के चन्द मिनटों पश्चात् कोहनी से कंधों के बीच रोग की स्थितिनुसार दर्द होने लगता है। अतः प्रारम्भ में अभ्यास के रूप में पांच मिनट ही करें एवं अभ्यास के पश्चात् धीरे-धीरे समय को बढ़ाया जा सकता है। जब तक पूर्ण अभ्यास न हो, थोड़े-थोड़े अन्तराल में इस मुद्रा को पुनः पुनः किया जा सकता है।  इस मुद्रा में गर्दन को बायें, दायें, ऊपर कर, शरीर को अलग-अलग स्थिति में मोड़कर कुछ देर तक करने से कंधों, हाथों एवं डायाफ्राम के ऊपर वाले भाग में प्राण ऊर्जा के अवरोध के अनुरूप तनाव आता है। जितना तनाव सहन किया जा सके उतने समय तक ही नमस्कार मुद्रा करनी चाहिए। शरीर के दाहिने एवं बायें भाग की हृदय,फेंफड़े, पेरीकार्डियन मेरेडियन में प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने लगता है जिससे उत्पन्न तनाव दूर होते हैं। वापस साधारण स्थिति में आते ही, तनावग्रस्त भाग में रक्त का प्रवाह ठीक होने लगता है। संबंधित मांसपेशियों में लचीलापन बढ़ने लगता है। तनावग्रस्त मांसपेशियों से संबंधित हथेली और पगथली में संबंधित एक्यूप्रेशर प्रतिवेदन बिन्दुओं पर दबाव दिया जाये या दाणा मेथी टेप पर चिपका लगा दी जाये या खिंचाव के कप कुछ देर लगाए जाए अथवा साधारण या चुम्बकीय मसाज और अन्य संबंधित उपचार किया जाये तो पुराने असाध्य रोगों में शीघ्र राहत होने लगती है।

गोदुहासन में नमस्कार मुद्राः-

                दोनों घुटनों को मिलाकर पंजों पर बैठने की स्थिति को गोदुहासन कहते हैं। पैर की अंगुलियाँ और अंगूठा स्वनियन्त्रित नाड़ी संस्थान को नियन्त्रित करते हैं। इस आसन में बैठने से मेरुदण्ड प्रायः सीधा रहता है। नाड़ी संस्थान पर दबाव पड़ने से उससे संबंधित असंतुलन दूर होता है और नाड़ी संबंधी सभी रोगों में आराम मिलता है। कमर, घुटनों, पैरों तथा गर्दन संबंधी सभी रोगों में इस आसन से लाभ होता है। गोदुहासन से पैर, रीढ़, कंधों का संतुलन ठीक होता है और मानसिक एकाग्रता बढ़ती है। भगवान् महावीर को केवलज्ञान इसी आसन में ध्यान करते हुए हुआ। इस आसन का अभ्यास भी धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है। इस आसन में नमस्कार मुद्रा करने से सभी रोगों का उपचार और अधिक प्रभावशाली हो जाता है।

नमस्कार मुद्रा में नमस्कार मंत्र के उच्चारण से उपचार अत्यधिक प्रभावशाली-

                मंत्र चयनित शब्दों के समूह का ध्वनि की तरंगों की निश्चित गति एवं ताल के साथ उच्चारण होता है, जिससे विशेष प्रकार की ऊर्जा का प्रवाह होता है। मंत्रोच्चारण से आभा-मंडल शुद्ध होता है। फलतः मन, मस्तिष्क एवं शरीर के विकार दूर होने लगते हैं। मंत्र न केवल स्थूल, अपितु सूक्ष्म शरीर को भी प्रभावित करता है।

                शरीर में ऊर्जा चक्रों की ऊर्जा के प्रवाह में आए हुए अवरोध मंत्र की तरंगों से दूर होने लगते हैं। नाभि से मस्तिष्क में णमों की ध्वनि के कंपन से मृत प्रायः कोशिकाएँ पुर्नजिवित होने लगती है। नई कोशिकाओं के निर्माण की गति बढ़ जाती है। रक्त प्रवाह सामान्य होने लगता है। प्रायः हम अपनी क्षमताओं का एक प्रतिशत भी उपयोग नहीं करते। मंत्रोच्चारण से मस्तिष्क का निष्क्रिय भाग सक्रिय होने लगता है, जिससे हमारी प्रतिरोधक क्षमता, समझ एवं सजगता बढ़ने लगती है। ‘मंत्र शरीर और मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा रखने का सरल आध्यात्मिक उपाय है।

समझपूर्वक मंत्रोच्चार अधिक प्रभावशाली होता है-

                मंत्रोच्चार का प्रभाव व्यक्ति के श्रद्धापूर्वक उच्चारण एवं आन्तरिक उत्साह के अनुरूप होता है। मंत्रोच्चारण दिखावटी और थोपा हुआ नहीं होना चाहिए। अक्षर पौद्गालिक होते हैं उनमें स्वयं में कोई चेतना शक्ति नहीं होती। परन्तु जब उसके साथ मन की श्रद्धा का संयोग हो जाता है तो उसमें चेतना शक्ति का प्रादुर्भाव होने लगता है। मन की एकाग्रता, निष्ठा, श्रद्धा ही मंत्र की शक्ति को जागृत करने में सर्वाधिक भूमिका निभाती है।

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाण, णमो लोए सव्वसाहूणं

  ‘णमो’विनय एवं नम्रता का प्रतीक है। पंच परमेष्ठी के पांचों पद अध्यात्म जगत में अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित आत्माओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। फलतः मंत्र महामंत्र बन जाता है।

                इन पाँच पदों में ‘णमो’के ‘मो’शब्द को एवं पाँच पदों में अंतिम शब्द ‘णं’को जितना लम्बा उच्चारण कर सकें, उच्चारण करें। णमो के उच्चारण के पश्चात् पूर्ण श्वास लेने के पश्चात् प्रत्येक पद का उच्चारण करें। ऐसा उच्चारण प्राणायाम का ही एक विशेष प्रकार हो जाता है।

                इस विधि द्वारा उच्चारण करने से गले में स्थित थायराइड एवं पेराथायराइड ग्रन्थियाँ तथा सिर में स्थित पीयूष और पीनियल ग्रन्थियाँ सक्रिय होने लगती हैं। जिन्हें पाँचों पद याद न हों वे मात्र ‘णमो अरिहंताणं’का इस विधि से जाप करने पर मंत्र चिकित्सा का लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इससे व्यक्ति की सोच सकारात्मक, मनोबल दृढ़ एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और शरीर में सुरक्षा कवच का निर्माण होने लगता है। उच्चारण में किसी भी प्रकार की जोर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। एक लय में सहज धीरे-धीरे उच्चारण को बढ़ाने का अभ्यास करना चाहिए। जितना लम्बा उच्चारण होगा, उतना ही अधिक लाभ मिलेगा। इस तरह जितनी देर कर सकें निरन्तर अभ्यास करें, परन्तु कम से कम समय बढ़ाते-बढ़ाते 15 मिनट का जाप अवश्य करना चाहिए।

                नमस्कार मुद्रा एवं गोदुहासन में नमस्कार मंत्र के उच्चारण से सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग चन्द दिनों में ही समाप्त होने लगते हैं। स्वस्थ व्यक्ति यदि मुद्रा का नियमित अभ्यास करें तो हृदय, फेंफड़े एवं मस्तिष्क संबंधित अंगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है। मंत्रोच्चारण से अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है, अतः स्वस्थ एवं रोगी कोई भी अपनी क्षमतानुसार इस आसन, मुद्रा और मंत्रोच्चारण के साथ अथवा अलग-अलग कर सकते हैं। अन्य चिकित्सा करते हुए भी इसे किया जा सकता है। जिससे वे उपचार अत्यधिक प्रभावशाली हो सकते हैं। जिनको नमस्कार मंत्र का उच्चारण करने में आपत्ति हो वे अपनी श्रद्धानुसार ओम् अथवा अल्ला हो, जैसे किसी अन्य लघु मंत्र का चयन करें। मंत्र का उच्चारण जितना लम्बा करेंगे उतना ज्यादा एवं जल्दी लाभ मिलेगा। शरीर में डायाफ्राम से ऊपर वाले भाग हृदय, फेंफड़े, मस्तिष्क, गले, मेरुदण्ड एवं हाथों संबंधी रोगों में यह प्रक्रिया अत्यधिक प्रभावशाली होती है। दमा, खांसी, श्वास एवं हृदय रोगियों के लिए तो गोदुहासन और नमस्कार मंत्र जाप के साथ नमस्कार मुद्रा के अभ्यास से चन्द दिनों में ही संतोषजनक परिणाम आने लगते है और अधिकांश हृदय रोगी Bye-Pass को Bye-Pass कर सकते हैं।

                सारांश यही है कि नमस्कार मुद्रा में किए गए आसन, प्राणायाम, अंग-व्यायाम, ध्यान, कायोत्सर्ग, भजन, कीर्तन, जप आदि शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं एवं इसका प्रभाव तत्काल अनुभव किया जा सकता है। चाहे बालक हो या वृद्ध, संत हो या गृहस्थ, यह मुद्रा सबके लिए करणीय है। पानी पीने से प्यास और खाना खाने से भूख शांत होती है, ठीक उसी प्रकार नमस्कार मुद्रा का लाभ भी उसका अभ्यास करने वाले को ही मिल सकता है। पाठकगण इस मुद्रा का प्रयोग कर अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करायेंगे तो जनहितकारी इस सरल मुद्रा की जानकारी जन-जन तक पहुँचाने की प्रेरणा मिलेगी।

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