क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

26. रंग चिकित्सा


सूर्य के किरणों की भांति विभिन्न रंगों की किरणों का भी हमारे जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। रंग हमारे आकर्षण का मुख्य स्रोत्र होते हैं। रंगों के सही संतुलन और तालमेल से बने दृश्य हमें आनन्ददायक लगते हैं। इसी कारण वस्त्रों का चयन, भवन की दिवारों के रंगों के चयन, सजावट आदि में रंगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। रंगों की तरंगों के प्रकम्पनों अथवा अन्य विधियों द्वारा उनका आवश्यकतानुसार उपयोग करने से हम स्वस्थ एवं रोग मुक्त जीवन जी सकते हैं। आयुर्वेद की अनेकों दवाईयाँ शरद पूर्णिमा की चाँदनी में ही बनाई जाती है। उस दिन रात भर चाँदनी के रंग से प्रभावित अनेकों खाद्य पदार्थ आज भी स्वास्थ्य वर्धक औषधि के रूप में लिये जाते हैं। रत्न चिकित्सक अलग-अलग रत्नों से निकलने वाली अलग-अलग रंगों की तरंगों के आधार पर उन रत्नों का शरीर के विशेष स्थानों पर स्पर्श करवाकर असाध्य रोगों का उपचार करने का दावा करते हैं। ज्योतिष विशेषज्ञ भी अलग-अलग ग्रहों के दुष्प्रभावों को कम करने हेतु अलग-अलग अंगुलियों में, अलग-अलग धातुओं के साथ आवश्यकतानुसार क्षमता के रत्नों को अंगुलियों में धारण करने का परामर्श देते हैं। पुष्प चिकित्सक अलग-अलग रंगों के पुष्पों के अर्क का उपचार हेतु दवा के रूप में उपयोग करते हैं।

                जीवन के लिए श्वास आवश्यक है। रंग हमारे शारीरिक, मानसिक और भावानात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। हम प्रतिक्षण श्वास के माध्यम से जिन पुद्गलों को ग्रहण करते हैं, वे वर्ण, गंध, रस, स्पर्श आदि से युक्त होते हैं। हमारे शरीर में भी प्रत्येक अवयव का अपना अपना अलग रंग होता है। इस प्रकार रंग का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है। बिना रंग व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। शरीर में किसी भी अवयव के रंग का असंतुलन रोग का कारण होता है। यदि रंगों को किसी विधि द्वारा संतुलित कर दिया जाये तो व्यक्ति स्वस्थ एवं रोग मुक्त हो सकता है। श्वास के अलावा हम प्रत्येक इन्द्रिय के विषयों के जो-जो पुद्गल ग्रहण करते हैं, उनमें भी रंग होता है। श्वास हमारे शरीर में रंगों का संतुलन पैदा करता है।

                आहार विशेषज्ञ शरीर के अवयवों के असंतुलन को दूर करने हेतु अन्य आवश्यक उपचारों के साथ-साथ उनको पुष्ट करने वाले रंगों के अनुसार फल, सब्जियाँ, अनाज तथा खाद्य पदार्थ खाने का परामर्श भी देते हैं। हमारे भावों का रंग के साथ गहन संबंध होता है। शरीर, मन, वाणी के साथ-साथ वाणी के प्रकम्पन भी रंगीन होते है। प्रत्येक व्यक्ति के आभा मंडल के चित्र किरिलियन केमरे से लिये जाये तो उनका रंग अलग-अलग क्यों होता है? सभी व्यक्तियों का रंग रूप एक सा क्यों नहीं होता? शरीर में भी किसी के बाल काले तो किसी के सफेद तो किसी के अन्य अलग-अलग रंगों के क्यों होते हैं? रक्त लाल ही क्यों होता है? आकाश नीला ही क्यों? सभी वनस्पतियाँ पेड़ पौधे एवं उन पर लगने वाले फल प्रारम्भ में हरे ही क्यों  होते हैं? आँखों की शल्य चिकित्सा के पश्चात् हरे रंग की पट्टी ही आँखों पर क्यों लगाई जाती है, अन्य रंगों की क्यों नहीं? शल्य चिकित्सा करते समय दुनियाँ भर के शल्य चिकित्सक प्रायः हरी पोशाक ही क्यों पहनते हैं? आँखों से दिखने वाले अलग-अलग प्राकृतिक दृश्यों, कपड़ों पदार्थों, चित्रों का सही तालमेल हमारे आकर्षण का एक मुख्य कारण होता है। हमें आनन्द, खुशी, प्रसन्नता प्रदान करता है। इसके विपरीत गलत रंगों का तालमेल हमें अरुचिकर लगता है। कारण यह स्पष्ट है कि रंग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। शरीर के प्रत्येक अंग और अवयव को अलग-अलग रंगों की विशेष आवश्यकता होती है तथा उसके असंतुलन से हम रोगी बन जाते हैं।

रंगों द्वारा आन्तरिक भावों की पहचान:-

                प्रत्येक मनुष्य के शरीर के चारों और एक आभामंडल होता है। प्रत्येक व्यक्ति के आभा मंडल के चित्र किरिलियन केमरे से लिये जायें, तो उनका रंग अलग-अलग क्यों होता है? उसके रंग भाव परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं। भाव और आभा मंडल का गहरा संबंध होता है। भाव शुद्धि द्वारा आभा मंडल को विशुद्ध बनाया जा सकता है तथा आभा मंडल के रंगों से भावों को जाना जा सकता है।

मुख्य मूल रंग:-

                मूल रंग मुख्यतया पाँच होते हैं। ये रंग सफेद, काला, लाल, पीला और आसमानी होते है। बाकी सभी रंग इन्हीं रंगों के अलग-अलग अनुपात में बने मिश्रण होते हैं। उदाहरण के लिए नारंगी रंग, लाल और पीला रंग के मिलाने से बनता है। हरा रंग, पीला और आसमानी रंग के मिलाने से बनता है। नीला रंग, आसमानी और सफेद रंग के मिलाने से बनता है। बैंगनी रंग, लाल व पीले रंग के मिलाने से बनता है। इसी प्रकार अन्य कोई भी रंग दो या अधिक रंगों के मिश्रण से बनाये जा सकते हैं।

पंच तत्त्व का रंगों से संबंध (मेरेडियन में प्रवाहित ऊर्जा):-

                चीनी पंच तत्त्व से संबंधित शोध करने वाले वैज्ञानिकों की ऐसी धारणा है कि प्रत्येक तत्त्व एवं उससे संबंधित ऊर्जा का अलग-अलग रंगों के प्रति आकर्षण अथवा उदासीनता भाव-शारीरिक असंतुलन अथवा रोग का प्रतीक होता है। जैसे किसी व्यक्ति को लाल रंग बहुत अच्छा लगता है। इसका मतलब उस व्यक्ति में अग्नि तत्त्व एवं ताप ऊर्जा शरीर में आवश्यकता से कम होती है, यदि लाल रंग पसंद न हों, देखते ही अरुचि होने लगें तो उसका मतलब उस व्यक्ति के शरीर में अग्नि तत्त्व एवं उससे संबंधित ताप ऊर्जा आवश्यकता से अधिक होती है। दोनों ही परिस्थितियाँ अग्नि तत्त्व से संबंधित हृदय-छोटी आंत अथवा मस्तिष्क (पेरीकार्डियन) मेरु दण्ड (ट्रिपल वार्मर) में असंतुलन का द्योतक होती है। परिणामस्वरूप रक्त परिभ्रमण अथवा नाड़ी संस्थान एवं मानसिक रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। इसी प्रकार हरे रंग के असंतुलन से वनस्पति तत्त्व (लीवर-पित्ताशय), पीले रंग का असंतुलन (तिल्ली-आमाशय), सफेद रंग का असंतुलन (फेंफड़े-बड़ी आंत) तथा काले या आसमानी (Dark Blue) गहरे या नीलें  रंग का असंतुलन (गुर्दे-मूत्राशय) में असंतुलन को द्योतक होता है। असन्तुलन का मतलब रोग और संतुलन का मतलब रोग मुक्तावस्था। इस प्रकार संबंधित रंगों को संतुलित कर हम स्वस्थ हो सकते हैं।

त्वचा के रंग की रोग में भूमिका:-

                त्वचा के रंग में परिवर्तन के आधार पर भी प्राण ऊर्जा के असंतुलन का सरलता से निदान किया जा सकता है। यदि त्वचा के किसी भाग में हरापन आ गया हो तो शरीर के उस भाग में वायु ऊर्जा का असंतुलन होने की प्रबल संभावना रहती है। इसी प्रकार शरीर के किसी भाग में त्वचा लाल हो जाने पर उस भाग में ताप ऊर्जा के असंतुलन, पीली पड़ जाने पर नमी ऊर्जा, मन्द कान्ति वाला फीका पड़ जाने पर शुष्क ऊर्जा और नीला या काला पड़ जाने पर शरीर के संबंधित भाग में ठण्डक ऊर्जा का असंतुलन, रोग का कारण हो सकता है।

                अतः उपर्युक्त अंगों से संबंधित रोगों की अवस्था में यदि किसी विधि द्वारा अभाव वाले संबंधित रंगों की तरंगों को प्रवाहित किया जायें तो तुरन्त स्वास्थ्य लाभ होता है। उसके लियें संबंधित रंग की किरणों को विद्युत बल्ब के माध्यम से संबंधित अंगों पर डाला जाता है। यदि वे अंग कमजोर अथवा निष्क्रिय हों तो संबंधित रंगों की किरणें उन पर डालने से अंग सक्रिय एवं शक्तिशाली होने लगते हैं। यदि रोग का कारण अंगों की आवश्यकता से अधिक सक्रियता हों तो संबंधित रंगों के प्रभाव को कम करने वाले रंगों की किरणें संबंधित भाग पर डालने से रोग मुक्त हुआ जा सकता है।

कपड़ों एवं वातावरण के रंगों का प्रभावः-

                लाल, पीला और नारंगी रंग गरम प्रकृति का होता है। अतः गर्मी की मौसम में इन रंगों के कपड़े नहीं पहनना चाहिए। नीले, हरे, बैंगनी और आसमानी कपड़ों का प्रयोग गर्मी में हितकर होता है। धूप के चश्में नीले या हरे रंग के अधिक शांतिदायक होते हैं। शयनागर की दिवारें और खिड़कियों का रंग भी ठण्डी प्रकृति वाले रंगों का होने से निद्रा अच्छी एवं गहरी आती है। इसके विपरीत यदि कमरे की दिवारों का रंग लाल हों या लाल बल्ब जल रहा हों, वहाँ निद्रा बराबर नहीं आती। ऐसे लाल वातावरण में रहने वालों को क्रोध अधिक आता है। ठण्डे रंगों का चिन्तन और ध्यान से गर्मी का प्रभाव कम होता है।

                सर्दी के मौसम में गर्म प्रकृति के रंगों का उपयोग गर्मी बढ़ाने से आरामदेय होता है। जिन देशों में सर्दी संबंधी रोगियों का प्रतिशत अधिक होता हैं, उनके लिए लाल, पीले, नारंगी रंग के कपड़े ज्यादा लाभप्रद होते हैं। पगथली ठण्डी होती हों तो लाल मौजों का प्रयोग करना चाहिए। गंठियाँ के रोगी अथवा जोड़ों में दर्द वालों को लाल कपड़े ज्यादा लाभप्रद होते हैं। सर्दी की मौसम में ठण्डक से सुरक्षा हेतु रजाई के अस्तर का रंग लाल रखना चाहिए। चर्म रोगियों को हरे रंग के कपड़े लाभदायक होते हैं। टोपी या हेल्मेट के अन्दर का भाग हरा रखने से मस्तिष्क शांत रहता है। शरीर की गर्म और लाली वाली सूजन वाले भाग पर नीला और सफेद मिश्रित कपड़ा पहनना चाहिए। पुरानी तथा सख्त सूजन वाले स्थान पर लाल कपड़ा पहनना चाहिए।

रंग संतुलन की स्वावलम्बी विधिः-

                प्रत्येक मनुष्य के शरीर के चारों तरफ एक आभामंडल होता है। उसके रंग भाव परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं। भाव और आभामंडल का गहरा संबंध होता है। अतः भावशुद्धि द्वारा आभामंडल को विशुद्ध किया जा सकता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार रंग की कमी से रोग हों तो उसी रंग के वातावरण की कल्पना करते हुये श्वास लेने से शरीर में उस रंग की पूर्ति होने लगती है। परन्तु रोग का कारण यदि किसी रंग की अधिकता से होता हैं तो उस रंग के चिन्तन के साथ रेचक करने से लाभ होता है। साथ ही उस रंग के प्रभाव को कम करने वाले रंग की अपने आसपास के वातावरण में कल्पना कर पूरक करने से अच्छे परिणाम आते हैं।

                लाल रंग बढ़ाने से नीले रंग, हरा रंग बढ़ाने से बैंगनी रंग से होने वाले तथा नीला रंग बढ़ाने से लाल रंग की अधिकता से होने वाले विकार दूर हो जाते हैं। शरीर के किसी भाग के उपचार हेतु लाल रंग की किरणों से उपचार करते समय, मस्तिष्क को आसमानी रंग की किरणें साथ-साथ अवश्य देनी चाहिये। रंग चिकित्सा से उपचार करते समय रोगी का स्वभाव उसके रंगों के प्रति रुचि या अरुचि, मौसम, उसके द्वारा पहनी जाने वाली पोषाक, आसपास दृष्टिगत होने वाले रंग, भोजन में लिए जाने वाले पदार्थों का रंग आदि भी प्रभावित करते हैं। जब दो विरोधी रंग अच्छे लगते हैं तो व्यक्ति का रोग पुराना एवं जटिल होता है।

                रंगों का संतुलन होते ही शरीर में रोग के बने रहने की संभावना नहीं रहती। अतः उपचार करते समय समग्र दृष्टिकोण से विभिन्न रंगों के गुणों को ध्यान में रख, रोग के लक्षणों एवं अन्य प्रभावों को ध्यान में रखकर रंगों का चयन करना चाहिए। नीला रंग गले के ऊपर के अंगों का मुख्य पोषक रंग होता है और साथ में रोगाणुनाशक गुण वाला तथा ठण्डी प्रकृति का होने से संकोचन करने वाला भी होता है। दांतों के दर्द और गले संबंधी रोगों में भी बिजली के नीले बल्ब की किरणों का प्रयोग अत्यधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है। अतः जहाँ सूर्य किरणें उपचार हेतु उपलब्ध न हों, संबंधित रंग के बिजली के प्रकाश का उपयोग भी किया जा सकता है।

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